क़्राफ्ट्समैन ट्रेनिंग स्कीम ( दस्तकार प्रशिक्षण योजना )

सन् 1950 में भारत सरकार ने इस योजना को शुरू किया । ये योजना व्यावसायिक प्रशिक्षण की सबसे प्रमुख योजना है । वर्तमान व भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर इस योजना को देश के विभिन्न राज्यों में फैली आई . टी . आई . द्वारा चलाया जा रहा है , जिसके कारण ही देश को प्रशिक्षित कामगारों की निर्बाध आपूर्ती हो पा रही है । सन् 1956 में आई . टी . आई . के दिन प्रतिदिन के कार्यों व प्रशासन को भारत सरकार ने राज्यों को सौंप दिया । इसके बाद सन 1969 में आई . टी . आई के वित्तीय कार्य भी राज्यों को सौंप दिये गये ।

तभी से सभी राज्यों की आई . टी . आई .का सम्पूर्ण प्रशासन सबन्धित राज्य सरकारों के पास है । विभिन्न इंजीनियरिंग व नान् इंजीनियरिंग व्यवसायों में इस योजना के अंतर्गत प्रशिक्षण रोज़गार एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय , नई दिल्ली के दिशा निर्देशों व मानदंडों के अनुसार दिया जाता है ।

पाठ्य क्रम , औज़ार उपकरण के मानदंड  , मान्यता , परीक्षा , प्रमाण पत्र इत्यादि रोज़गार एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय , नई दिल्ली के नियमों के अनुसार ही दिये जाते हैं ।

सन् 1956 में  भारत सरकार ने पूरे भारत में व्यावसायिक प्रशिक्षण में एकरूपता व समानता लाने के लिये एन . सी . वी . टी . ( राष्ट्रीय व्यावसायिक प्रशिक्षण परिषद ) की स्थापना की । इस परिषद को क़्राफ्ट्समैन ट्रेनिंग स्कीम का पाठ्य क्रम बनाने , स्टैंडर्ड व मानक तय करने , परीक्षा लेने  व राष्ट्रीय व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रमाण पत्र ज़ारी करने का काम दिया गया ।

इसका मतलब ये हुआ कि राजस्थान , तमिलनाडू , आसाम , पंजाब , बंगाल से लेकर गुजरात इत्यादि भारत के सभी राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में एन . सी . वी . टी . मान्यता का प्रशिक्षण पाने वाले सभी छात्रों का पाठ्य क्रम समान है । पूरे भारत में एक साथ ही अंतिम राष्ट्रीय व्यावसायिक परीक्षा का आयोजन होता है । प्रश्न पत्र भी समान ही होता है । परीक्षा सफलता पूर्वक पास करने पर मिलने वाला राष्ट्रीय व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रमाण पत्र भी समान स्तर का होता है । इस प्रकार से किसी भी राज्य से राष्ट्रीय व्यावसायिक प्रशिक्षण पाने वाले वाला छात्र पूरे भारत में रोज़गार पा सकता है ।

 

 

क़्राफ्ट्समैन ट्रेनिंग स्कीम ( सी . टी . एस .)  योजना को लाने के प्रमुख कारण निम्न हैं -

1.उद्योगों में विभिन्न व्यवसायों के लिये प्रशिक्षित कामगारों की निर्बाध आपूर्ती सुनिश्चित करने के लिये ।

2. उद्योगों के उत्पादन मे संख्यात्मक व गुणात्मक सुधार करने के लिये ।

3.शिक्षित युवाओं की बेरोज़गारी कम करके उन्हें उद्योगों में रोज़गार दिलाने के लिये ।

 

 

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